कुसंगति के दुष्परिणाम पर निबंध

कुसंगति के दुष्परिणाम :

कुसंगति का अर्थ होता है – बुरी संगत। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होता है। जब तक वो समाज में संबंध प्राप्त नहीं कर पाते हैं तब तक वो अपने जीवन को आगे नहीं बढ़ा पाते हैं। समाज में कई तरह के लोग होते हैं। कुछ अच्छे लोग होते हैं तो कुछ बुरे लोग होते हैं।

जब व्यक्ति की संगत अच्छी होती है तो उससे उसकी जड़ता को दूर किया जाता है। सत्संगति से मनुष्य की वाणी, आचरण में सच्चाई आती है। मनुष्य के अंदर से पापों का नाश होता है। इससे मनुष्य के अंदर की बुराईयाँ खत्म हो जाती है।

लेकिन कुसंगति सत्संगति की बिलकूल उल्टी होती है यह मनुष्य के अंदर बुराईयाँ पैदा करती है। कुसंगति मनुष्य को बुरे रास्ते पर ले जाती है। जो व्यक्ति सत्संगति के विरुद्ध होता है वह कुसंगति के अधीन होता है।

यह कभी भी नहीं हो सकता है कि मनुष्य कुसंगति के प्रभाव से बच सकता है। जो व्यक्ति दुष्ट और दुराचारी व्यक्तियों के साथ रहते हैं वे व्यक्ति भी दुष्ट और दुराचारी बन जाते हैं। इस संसार में व्यक्ति या तो भगवान की संगत पाता है या फिर बुरे व्यक्ति की संगत में पड़ जाता है क्योंकि मानव का समाज के अभाव में अस्तित्व नहीं है।

आचरण की पहचान :

किसी भी व्यक्ति के आचरण को जानने के लिए उसके दोस्तों के आचरण को जानने की जरूरत होती है। यह इसलिए करना चाहिए क्योंकि जिस व्यक्ति के दोस्त दुष्ट और दुराचारी होते हैं वह भी दुष्ट और दुराचारी ही होगा। व्यक्ति पर संगती का असर जाने-अनजाने में पड़ ही जाता है।

बचपन से व्यक्ति अपने आस-पडोस और परिवार से जो कुछ भी सीखता है वह उन सब को ही दोहराता है। जब व्यक्ति गाली को सुनता है तभी तो उसे गाली देने की आदत पडती है। सत्संगति का किसी भी मनुष्य के चरित्र में बहुत बड़ा हाथ होता है। अगर व्यक्ति अच्छी पुस्तकें पढ़ता है तो वह भी सत्संगति होती है।

जो लेखक विद्वान होता है वह अपनी पुस्तकों से ही हमारे साथ रहता है। अच्छी पुस्तक और महान लोग हमारे मित्र होते हैं और हमें रास्ता दिखाते हैं इनके बताये हुए रास्ते पर चलने से व्यक्ति का जीवन कंचन के समान हो जाता है। दुष्टों और दुराचारियों का संग देने से मनुष्य का जीवन भी उसी की तरह का बन जाता है। ऐसे लोग व्यक्ति को पतन की तरफ ले जाते हैं। मनुष्य को विवेक प्राप्त करने के लिए सत्संगति को अपनाना चाहिए।

कुसंगति के दुष्परिणाम :

कुसंगति का मनुष्य पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। किसी भी व्यक्ति को अच्छी बातें सीखने में थोडा समय लग जाता है लेकिन वही व्यक्ति बुरी बातों को सीखने में बिलकुल भी समय नहीं लगाता है। जो व्यक्ति जिस तरह के व्यक्तियों के साथ बैठता है वो उन्ही की तरह का बन जाता है।

जब अच्छे व्यक्ति बुरे व्यक्तियों के साथ रहने लगता है तो अच्छा व्यक्ति भी बुरा बन जाता है। अगर हमें किसी भी व्यक्ति के बारे में यह पता लगाना है कि उसका चरित्र कैसा है तो सबसे पहले उसके दोस्तों से बात चीत करनी चाहिए। एक व्यक्ति के व्यवहार से ही उसके चरित्र का पता लग जाता है।

जो व्यक्ति कुसंगति के शिकार होते हैं वे किसी की बात नहीं सुनते हैं और सभी को गलत समझते हैं। वे जिन लोगों को अपना दोस्त समझते हैं उनसे बढकर उन्हें कोई भी अपना नहीं लगता है लेकिन वे लोग ही उसको दोखा देते हैं।

वह अपने घर वालों की नजरों में भी बुरा बन जाता है और समाज भी उसे बुरा मानता है। मनुष्य अपने जीवन में कहीं का भी नहीं रहता है। ऐसा व्यक्ति न ही तो अपने परिवार का कल्याण कर पाता है और न ही अपने देश और समाज के लिए अपने कर्तव्य को निभा पाता है।

अच्छी संगती की आवश्यकता :

किसी व्यक्ति के लिए उन्नति का मार्ग सिर्फ सत्संगति से ही खुलता है। सत्संगति से सत्य और भगवान के प्रति हमारी जिज्ञासा बढ़ जाती है। आगे आने वाले समय में लोगों को बुरी संगत से बचाने के लिए अच्छी संगत की बहुत जरूरत होती है। बच्चों को अच्छी संगत पर चलाने से उसका चरित्र पूरे समाज में प्रसिद्ध होता है लेकिन जो बच्चे बुरी संगत को अपनाते हैं समाज में उनका कोई भी सम्मान नहीं करता है।

जो लोग सत्संगति को अपनाते हैं वे अपने बल पर कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं लेकिन जो कुसंगति को अपनाते हैं उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। जो लोग कुसंगति को अपनाते हैं वो लोग बुरे रास्ते पर चल देते हैं लेकिन जो लोग अच्छी संगत को अपनाते हैं वो कभी भी अपने रास्ते से नहीं भटकते हैं।

जो बुरी संगत को अपनाते हैं उन्हें अपने परिवार पर भरोसा नहीं होता है इसी वजह से अच्छी संगत की बहुत जरूरत होती है। जिनमें अच्छी संगत होती है वे अपने परिवार पर हमेशा भरोसा करते हैं। जिस प्रकार अगर एक पुत्र अच्छी संगत का हो तो वह अपने जीवन में हमेशा उन्नति के शिखर पर रहेगा।

सज्जन और दुर्जन का संग :

कुसंगति की अनेक हानियाँ होती है। संसार में गुण और दोष दोनों ही होते हैं। जो मनुष्य दुराचार, पापाचार, दुश्चरित्रता गुण से ग्रस्त होता है वह कुसंगति के वश में होता है। आज के समय में विद्यार्थियों को कुसंगति के प्रभाव से बिगड़ते हुए सभी ने देखा होगा।

जो विद्यार्थी कभी प्रथम श्रेणी पर आते थे वे फेल होने लग जाते हैं यह सब कुसंगति का प्रभाव होता है। इसी कुसंगति से बहुत से घर नष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति बुद्धिमान से भी बुद्धिमान होता है उस पर कुसंगति का बहुत प्रभाव पड़ता है।

एक महान कवि ने कहा था कि सज्जन और दुर्जन दोनों ही व्यक्तियों का साथ ही हमेशा अनुचित होता है | यह कुछ नहीं बस विषमता को ही जन्म देता है। हम अक्सर देखते हैं कि बुरा व्यक्ति तो बुराई छोड़ नहीं पाता हैं लेकिन उसकी संगत से अच्छा व्यक्ति भी बुरा बन जाता है। कभी भी बुरा व्यक्ति अपनी बुराई को छोड़ नहीं पाता है, वह कुछ भी कर ले लेकिन उसका साथ नहीं छोड़ पाता है।

कुसंगति से बचने के उपाय :

सत्संगति मनुष्य के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर मनुष्य को जीवन में उन्नत और सफल होना है तो उसे सत्संगति के मार्ग को अपनाना ही होगा। सत्संगति के मार्ग पर चलकर ही वो अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है। सत्संगति का अर्थ होता है अच्छे व्यक्तियों की संगत।

जो व्यक्ति अच्छे व्यक्तियों की संगत में रहते हैं उनके उन्नति के रास्ते में कभी भी कोई बाधा नहीं आती है। वे हमेशा उन्नति की तरफ चलते रहते हैं। जब मनुष्य बुद्धिमान, विद्वान्, और गुणवान लोगों की संगत को अपनाते हैं तो उस व्यक्ति में अच्छे गुणों का बहुत ही तेजी से विकास होता है और वह सत्संगति से परिचित हो जाता है।

सत्संगति से व्यक्ति के अंदर जो दुर्गुण होते हैं वो नष्ट हो जाते हैं। सत्संगति से मनुष्य की बुराईयाँ दूर हो जाती हैं और उसका मन बहुत ही पवित्र या पावन हो जाता है। वह सभी प्रकर की बुराईयों से मुक्त हो जता है।

सत्संगति के प्रकार :

सत्संगति का अर्थ होता है – अच्छी संगत। सत्संगति दो तरह की होती है। एक तो जब कोई व्यक्ति किसी बुद्धिमान, विद्वान् व्यक्ति के साथ रहकर उसकी संगति को प्राप्त करता है और दूसरी तरफ कोई व्यक्ति किताबों और सत्संगों से संगत प्राप्त करता है।एक में कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से सीखता है और दूसरे में कोई व्यक्ति किताबों और सत्संगों से सीखता है।

सत्संगति को अपनाने से मनुष्य के अंदर के ज्ञान में वृद्धि होती है। जो व्यक्ति सत्संगति को अपनाते हैं उन पर कुसंगति का कोई असर नहीं पड़ता है। जिस तरह से मधुमक्खियाँ शहद को बनाती है लेकिन खुद उस शहद को कभी नहीं खाती हैं। उसी तरह चंदन के पेड़ से साँप लिपटे रहते हैं लेकिन चंदन में कभी भी विष व्याप्त नहीं होता है।

उपसंहार :

किसी भी व्यक्ति के जीवन में संगति का बहुत महत्व होता है। किसी भी जीवन की विजय और पराजय उसकी संगति पर निर्भर करती है। जो व्यक्ति बुरा होकर भी विद्वान् होता है उसका जीवन व्यर्थ होता है। अगर हमें जीवन में सफलता और उन्नति प्राप्त करनी है तो अपने जीवन की संगति पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है।

जो व्यक्ति बुरे व्यक्तियों के साथ रहता है वह भी बुरा बन जाता है। सब लोगों को पता होता है कि सच सच को जन्म देता है, अच्छाई अच्छाई को जन्म देती है, और बुराई बुराई को जन्म देती है। अगर मनुष्य कुसंगति से बचा रहे तो उसी में उसकी भलाई होती है।

है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है हिंदी निबंध

है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना :

भूमिका : अँधेरे और उजाले का संघर्ष बहुत सालों से होता आ रहा है। भारतवासियों ने अनेक साल अंधकार में बिताये हैं। भारत देश को अँधेरे की आदत पड़ गई थी। लेकिन महात्मा गाँधी जी ने भारत देश को एक आशा की किरण दिखाई थी। इसी पर हरिवंशराय बच्चन जी ने एक कविता भी बनाई थी।

यह पंक्ति हरिवंशराय बच्चन जी की कविता की है। इस पंक्ति से बच्चन जी ने हमें बहुत ही अच्छा संदेश दिया है। उनका मानना है कि चाहे चारों तरफ दुःख, निराशा और अंधकार छाया हो लेकिन मनुष्य को कभी-भी हार नहीं माननी चाहिए। मनुष्य का कर्तव्य होता है कि वह निरंतर संघर्ष करता रहे और सभी के मन में आशा और उम्मीद के दीपक जलाए।

जब एक मनुष्य को संघर्ष करते हुए लोग देखेंगे तो उनमें अपने आप ही संघर्ष करने की भावना पैदा हो जाती है। इसी तरह से लोगों में एक आशा या उम्मीद पैदा होती है। जब मनुष्य किसी काम में असफल हो जाता है तो उसे लगता है कि अब वह कोई भी काम पूर्ण नहीं कर सकता।

प्रकृति के नियम : प्रकृति के अपने नियम होते हैं प्रकृति का नियम होता है कि कृष्ण पक्ष के बाद शुक्ल पक्ष आता है। जब जेठ-बैसाख की गर्मियां आती है तो भयंकर लू चलती हैं। गर्मियों में चारों तरफ तपती हुई धूप होती है और धूल उड़ाते हुए मनुष्य के लिए बहुत सी समस्याएँ पैदा करती हैं।

जेठ-बैसाख के बाद सावन आता है जो अपने साथ सुहावना मौसम और बादल लेकर आता है। जब मूसलाधार वर्षा समाप्त हो जाती है तो सर्दियां चारों तरफ ठंड फैलाने लगती हैं। फिर से पतझड़ आती है लेकिन पतझड़ के समाप्त होने के बाद बसंत का आगमन होता है। प्रकृति की यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।

प्रकृति की प्रक्रिया की तरह ही सुख-दुःख आशा-निराशा आते-जाते रहते हैं। प्रकृति के नियमों के साथ जब मनुष्य छेड़छाड़ करता है तो मनुष्य के जीवन में अनेक समस्याएँ पैदा होती है। मनुष्य प्रकृति के कहर से कभी-भी उभर नहीं पाता है। अनेक आपदाएं मनुष्य को बिलकुल ही अंधकार से भर देती है। लेकिन जब मनुष्य प्रकृति के नियमों का पालन करता है तो प्रकृति उसे संघर्ष और परिश्रम करने की प्रेरणा देती है।

विद्यार्थी जीवन में महत्व : बच्चन जी की पंक्तियाँ मनुष्य में आशा उत्पन्न करती हैं। बच्चन जी की पंक्तियों का सर्वप्रथम असर विद्यार्थियों के जीवन पर पड़ता है। जब विद्यार्थी परीक्षा में असफल हो जाते हैं तो वे निराश होकर और हार मानकर बैठ जाते हैं।

विद्यार्थी यह सोचने लग जाते हैं कि अब कोई भी कार्य सफल नहीं हो पाएगा। वह सोचने लगता है कि अब तो चारों ओर बस निराशा और अंधकार है। उनमें सोचने की शक्ति समाप्त हो जाती और वे यह नहीं सोचते हैं कि रात के बाद सुबह ही आती है।

उनके एक बार परीक्षा में असफल हो जाने से जीवन समाप्त नहीं होता है जीवन निरंतर परिवर्तनशील रहता है। किसी को भी इस बात के लिए निषेध नहीं होता है कि जो एक बार परीक्षा में फेल हो गया वो दुबारा से परीक्षा नहीं दे सकता है।

इस तरह के विद्यार्थियों को दुबारा से परीक्षा देनी चाहिए और परीक्षा में सफलता प्राप्त करनी चाहिए। जो विद्यार्थी विद्या को चाहते हैं उन्हें आशावादी होना चाहिए। विद्यार्थी जीवन में परिश्रम का बहुत महत्व होता है। यदि विद्यार्थी आरंभ से ही स्वालंबी बनेगा तो वह आसानी से सफलता प्राप्त कर सकेगा।

जीवन चलने का नाम : जीवन में सुख हैं तो दुखों का आना निश्चित होता है। असफलता को मानव जीवन की पहली सीडी माना जाता है। जब मनुष्य आशा लेकर जीवन की कठिन परिस्थियों का सामना करता है तो वह कभी-भी असफल नहीं हो सकता है।

जीवन रुकने का नाम नहीं होता है जीवन चलने का नाम होता है। जीवन रूपी रास्ता भी मनुष्य को यही उपदेश देता है। आप किसी रास्ते को ले लीजिये वह कभी भी खत्म नहीं होता है वह निरंतर चलता ही रहता है।

जीवन भी रास्ते की तरह होता है यह निरंतर चलता रहता है कभी-भी नहीं रुकता। जीवन रूपी रास्ता केवल मृत्यु के पथ पर पहुंचकर ही समाप्त होता है। आप किसी जल धारा को ही ले लीजिये वह कभी नहीं रूकती है वह बहुत से पर्वत, पत्थर, राज्य, परदेश पार करती है लेकिन फिर भी अपने लक्ष्य तक पहुंचने तक रूकती नहीं है।

प्रयत्न और परिश्रम की महिमा : असफलता के बाद दुबारा प्रयत्न करना बहुत जरूरी होता है क्योंकि इसी से सफलता मिलती है। किसी भी प्राणी के जीवन में परिश्रम और प्रयत्न की बहुत महिमा होती है। परिश्रम और संघर्ष करके हम अपना खोया हुआ मान-सम्मान दुबारा से प्राप्त कर सकते हैं।

जब कोई साधारण व्यक्ति परिश्रम करता है तो वह भी असाधारण बन जाता है। हमारे भारत में ऐसे अनेक महान पुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने परिश्रम और संघर्ष के बल पर भारत को स्वतंत्रता दिलाई थी। हमारे महान पुरुषों ने ऐसे महान कार्य किये थे जिससे अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा था और अंत में 15 अगस्त, 1947 को हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी।

चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु ने यह शपथ ली थी कि जब तक वह नन्द वंश को बर्बाद नहीं कर देगा वह अपनी चोटी में गांठ नहीं लगाएगा। उसने अपनी शपथ पूरी की और चन्द्रगुप्त को नन्द वंश का राजा बनाया था। इस संसार में चलना आग पर चलने के बराबर होता है। जिस तरह आग पर चलने के लिए साहस और परिश्रम की जरूरत होती है उसी तरह जीवन में भी परिश्रम और प्रयत्न की जरूरत होती है।

उपसंहार : असफलता, परिश्रम, सफलता और पराजय जीवन के साथ-साथ चलते हैं। असफलता रूपी अंधकार जीवन के आशा के सूरज को पूरी तरह से ढक देता है। निराशा में जब मनुष्य अपने मन में एक आशा को उत्पन्न करता है तो जीवन में सफलता प्राप्त हो जाती है। जब अनेक संघर्षों के बाद सफलता मिलती है तो उसका अलग ही आनंद होता है। हमें अपने देश को सुदृढ बनाने के लिए बहुत परिश्रम करने की आवश्यकता है।

नर हो न निराश करो मन को पर निबंध

नर हो न निराश करो मन को :

भूमिका : सभी लोगों को पता होता है कि नर शब्द का अर्थ पुरुष होता है। नर और पुरुष दोनों एक शब्द के व्यंजन होते हैं। नर का अर्थ पुरुष होता है लेकिन हम गंभीरता से इस शब्द के बारे में सोचें तो हमें यह पता चलता है कि नर शब्द के व्यंजक प्रयोग से पुरुष की विशिष्टता बताई जाती है। पुरुष एक मननशील प्राणी होता है।

मनुष्य अपने मानसिक बल के आधार पर बहुत से असंभव कामों को भी संभव कर सकता है। जब पुरुष के पुरुषत्व भाव को व्यक्त करना होता है तब नर शब्द को प्रयोग में लाया जाता है। मनुष्य जो भी कामों और उद्योग में उन्नति करने की कोशिश करता है वो सब उसके मन के बल पर ही निर्भर करता है। अगर मनुष्य का मन क्रियाशील नहीं रहता है तो उसका मन मर जाता है।

‘नर हो, न निराश करो मन’ को पंक्ति में उसके अर्थ और भाव-विस्तार का विवेचन करते हैं तो मानव जीवन के जो पक्ष होते हैं वे अपने आप ही उजागर हो जाते हैं। जब किसी व्यक्ति का मन मर जाता है तो उसके लिए सभी आकर्षण तुच्छ और अर्थरहित हो जाते हैं। जब तक मनुष्य का मन मरता नहीं है तब तक वह कुछ भी कर सकता है लेकिन जब व्यक्ति का मन मर जाता है तो व्यक्ति भी हार जाता है।

छोटी सी असफलता से निराश न होना :

जब हम ‘नर हो, न निराश करों मन को’ पंक्ति को सुनते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कोई हमें चुनौती देते हुए कुछ कह रहा हो कि तुम सांसारिक जीवन की छोटी कठिनाईयों को से घबरा जाते हो क्योंकि तुमने अभी तक जीवन की बाधाओं का सामना करना नहीं सीखा है। जब वे ऐसे बोलने लगें जैसे जमीन फट जाएगी या आसमान फट जायेगा।

तुम पुरुष हो और वीरता तुम्हारे पास है। एक बार की असफलता से इस तरह से निराश नहीं होना चाहिए हमें परिस्थितियों का डंटकर सामना करना चाहिए। हमें एक चिड़िया से भी सबक लेना चाहिए क्योंकि वह कभी भी हार नहीं मानती है वह अपने घोंसले को बनाने के लिए बहुत मेहनत करती है।

वह तब तक नहीं हारती जब तक अपने घोंसले को पूरा नहीं कर देती। दूसरी तरफ मनुष्य होता है जो छोटी-छोटी बात पर निराश होकर बैठ जाता है उसे कभी भी निराश नहीं होना चाहिए। उसे अपने लक्ष्य तक पहुंचने तक परिश्रम करते रहना चाहिए।

मानसिक बल का महत्व :

जब कोई इंसान अपने लाभ या उन्नति के लिए काम करता है वो उसका मानसिक बल होता है। किसी विद्वान् ने कहा है – मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। जब तक मनुष्य को अपने मानसिक बल पर विश्वास होता है उसे कोई नहीं हरा सकता है लेकिन जब मन मर जाता है तो व्यक्ति भी हार जाता है।

इसी मानसिक बल के आधार पर भगवान संकट मोचन हनुमान ने भगवान शिव को युद्ध में पराजित किया था। नेपोलियन और गुरु गोबिंद सिंह जी ने इसी बल के आधार पर अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। अगर मनुष्य मानसिक रूप से निष्क्रिय हो जाता है तो वह कोई भी काम नहीं कर पाता है।

मनुष्य के मानसिक बल में अपने अराध्य में आस्था की वजह से वृद्धि होती है। जब कोई व्यक्ति या पशु-पक्षी अपने भगवान का नाम लेकर किसी काम को करता है तो उसके काम में असफल होने का कोई भी कारण नहीं होता है। उससे सफलता प्राप्त करने के लिए बहुत संघर्ष भी करना पड़ सकता है लेकिन उसे सफलता हर हालत में मिलती है। उसे कोई भी पराजित नहीं कर पाता है।

प्रकृति से प्रेरणा :

जिस मनुष्य में बल और बुद्धि होती है वह मनुष्य सभी प्राणियों में सबसे श्रेष्ट माना जाता है। अगर वह अपने जीवन में आने वाली कठिनाईयों में मुंह लटकाकर या फिर निराश होकर बैठ जाता है तो उसके प्राणियों में श्रेष्ठ होने का कोई मतलब नहीं होता है। मनुष्य को प्रकृति के हर छोटे से लेकर बड़े प्राणी से हमेशा प्रेरणा लेनी चाहिए।

अगर वो परिश्रम और साहस करना ही छोड़ देगा तो उसका समाज में विकास कैसे होगा? उसके लिए हर तरह की उन्नति के रास्ते बंद हो जायेंगे। इसीलिए मनुष्य को अपने नरत्व को सिद्ध करना ही होगा। अगर निराषा ही जीवन का लक्ष्य होती तो देश में वो सब विकास आज तक हुए ही न होते जो अब तक देश में हुए हैं।

नरता का लक्ष्ण होता है आगे बढ़ते रहना और संघर्ष करते रहना। मनुष्य को नदियों से प्रेरणा लेनी चाहिए। नदियाँ जब तक समुद्र में न मिल जाएँ तब तक थमती नहीं हैं उसी तरह मनुष्य को भी जब तक लक्ष्य पूरा न हो जाये संघर्ष करते रहना चाहिए। हम लोग देख सकते हैं कि कभी-कभी चट्टान नदी की धारा को रोकने की कोशिश करती है लेकिन असफल हो जाती है धारा उसे किनारे पर लगाकर अपना रास्ता खुद ही बना लेती है।

नदी की धारा को किसी की सहायता की जरूरत नहीं पडती है। जब झाड़-झाखंड उसे रोकते हैं तो वह उनके रोकने से भी नहीं रूकती है। मनुष्य को भी नदियों की तरह ही काम करना चाहिए। मनुष्य को जीवन में आने वाली समस्याओं का डटकर सामना करना चाहिए। अपनी समस्याओं में सफलता प्राप्त करनी चाहिए।

समस्याओं के सामने आने से जब मनुष्य निराश होकर बैठ जाता है तो इससे उसकी सार्थकता सिद्ध नहीं होती है। वह नर तभी कहलाता है जब वह जीवन की सभी कठिनाईयों का डटकर सामना करता है इसी को सच्चे अर्थों में जीवन कहते हैं और यही नरत्व को व्यक्त करता है।

जीवन में परिवर्तन शीतलता :

हमारा संसार एक परिवर्तनशील संसार है। इसमें सुख और दुःख आते जाते रहते हैं। दुःख के बाद सुख आता ही है और सुख के बाद दुःख आता है। हमें दुःख से घबराना नहीं चाहिए। जो व्यक्ति बुद्धिमान होते हैं उन्हें अपने जीवन के प्रति आशावान दृष्टिकोण रखना चाहिए।

जिस की वजह से वह अपना और अपने राष्ट्र का कल्याण करने में मदद कर सके। मन को हराने से कुछ प्राप्त नहीं होता है न ही कुछ बनता है बनने के स्थान पर सब कुछ बिगड़ जाता है। सुख-दुःख, सफलता-असफलता दोनों ही भगवान की दी हुई वस्तुएँ होती है लेकिन भगवान भी उन्हीं का साथ देता है जो संघर्ष करते हैं।

अगर आप जीवन में संघर्ष करंगे तो आपको सफलता जरुर मिलेगी। जो लोग भगवान पर सब कुछ छोड़ देते हैं और खुद संघर्ष नहीं करते उनका साथ भगवान भी नहीं देता है। अगर आप अपने ही दुःख से घबरा जाते हैं तो वह आपको कभी भी सुख नहीं देता है।

निरंतर संघर्ष करना जीवन है :

एक नर होकर निराश होना उसके लिए शोभा की बात नहीं होती है। जो लोग हिम्मत हार कर या निराश होकर बैठ जाते हैं उनकी हालत बिलकुल वैसी होती है जैसी हालत मणि के बिना साँप की होती है। मणि की वजह से ही साँप की चमक खत्म हो जाती है। हिम्मत और उत्साह ही मनुष्य की जिंदगी में सार्थकता प्रदान करते हैं इसके बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ होता है।

जब मनुष्य सार्थकता को खो देता है तो वह नर कहलाने के लायक नहीं रह जाता है। ऐसा उसकी नरता के पतित होने के कारण से और अपने आप को कण-ही-कण नहीं छोड़ देने की तरह होता है। इसी वजह से कहा गया है कि नर होकर मन को निराश मत करो। निराषा की वजह से जीवन अंधकार से भर जाता है।

इस अंधकार की वजह से उसे कोई भी रास्ता समझ में नहीं आता है। अगर वो आशावान और आस्थावान रास्ते को अपनाता है तो उसका जीवन का लक्ष्य अपने आप ही खुल जाता है। मेहनत में जो आनंद आता है वो किसी और में नहीं होता है। अगर आप निराषा को अपनाते हैं तो उस आनंद को भी खो देते हैं।

इच्छा शक्ति का महत्व :

मनुष्य की मानसिक शक्ति केवल उसकी इच्छा शक्ति पर निर्भर करती है। जिस मनुष्य की इच्छा शक्ति जितनी अधिक बलवान होती है उसकी मानसिक शक्ति उतनी अधिक प्रबल और दृढ होती है। इसी इच्छा शक्ति से मनुष्य उस दैव शक्ति को प्राप्त कर सकते हैं जिसके आगे लाखो-करोड़ो लोग खुद ही नत-मस्तक हो जाते हैं।

अगर मनुष्य की इच्छा शक्ति प्रबल होती है तो वह अपनी मौत के रास्ते को भी मोड़ सकता है। गाँधी जी ने अपनी प्रबल इच्छा शक्ति के बल पर ही उन्होंने अनेक दुश्मनों को अपने आगे नत-मस्तक किया था। इसी प्रबल इच्छा शक्ति की वजह से ही गाँधी जी एक आम इंसान से महान बन गये थे।

समस्याएँ और बाधाएँ सभी मनुष्यों के जीवन में आती है चाहे वह एक महान मनुष्य हो या एक आम इंसान। अंतर बस इतना ही होता है कि जो व्यक्ति आम होते हैं वे अपने जीवन की कठिनाईयों को देखकर बहुत ही जल्दी हार मान लेते हैं और जो व्यक्ति महान होते हैं वे अपने जीवन की कठिनाईयों का डटकर सामना करते हैं और उन पर सफलता प्राप्त करते हैं।

कठिन परिस्थियों और उन पर दृढता से सफलता प्राप्त करना ही मनुष्य को महान बनाता है। एक भावी संतान के लिए ये रास्ते ही आदर्श बन जाते हैं और ये ही उनको रास्ता दिखाते हैं।

आशावादिता :

जो आशावान मन होता है वह मनुष्य का संचार सूत्र होता है। जिस मनुष्य के मन में आशा होती है वह अपने जीवन में बड़े-से-बड़े वीरता और साहस के काम को आसानी से पूरा कर लेता है। इसी आशा से मनुष्य को काम करने की प्रेरणा मिलती है। आशा बहुत ही बलवान होती है इसी आशा से हम किसी भी कार्य को आसानी से कर पाते है।

कभी भी आशावादी व्यक्ति अकर्मण्य नहीं होता है वो हमेशा मुश्किल-से-मुश्किल परिस्थिति का डटकर सामना करता है। पल-पल में बदलने वाले इस संसार में सुख, दुःख, लाभ, हानि, उत्कर्ष, अपकर्ष आते-जाते रहते हैं।

जो व्यक्ति बुद्धिमान होता है वह भविष्य में आने वाली मुश्किलों से कभी-भी घबराता नहीं है वह कभी-भी अपने मन को हारने नहीं देता है। वह मुश्किलों का डटकर सामना करता है और उन पर सफलता प्राप्त करता है।

उपसंहार :

नर की नरता को केवल निराशा को त्यागकर संघर्ष को अपनाने में ही देखा जा सकता है। मनुष्य को जीवन में सफलता प्राप्त करनी चाहिए और कठिन-से-कठिन परिस्थिति का सामना करना चाहिए। मनुष्य के संघर्ष और परिश्रम से ही मनुष्य की सार्थकता सिद्ध होती है।

उसे कभी-भी अपने मन को विचलित नहीं करना चाहिए। अगर वो अपने मन की चंचलता को अपने वश में कर लेगा तो उसका मन विचलित नहीं होता है। सुदृढ मनोबल से ही सफलता को प्राप्त किया जा सकता है।

जिसका मनोबल सुदृढ नहीं होता है वह कभी-भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है। बुद्धिमान लोग ही मन का अनुशरण करके सफलता को प्राप्त कर सकता है क्योंकि वह अपने मन पर विजय प्राप्त कर चुका होता है। इसी वजह से कहा गया है – नर हो, न निराश करो मन को।