मानव और विज्ञान पर निबंध-Science and Human Entertainment Essay In Hindi

मानव और विज्ञान पर निबंध :

भूमिका : आज का मानव प्राचीन युग के मानव से बिलकुल अलग बन गया है। आज के युग को विज्ञान के चमत्कारों का युग माना जाता है। विज्ञान दो शब्दों से मिलकर बना है- वि+ज्ञान। जिसका अर्थ होता है किसी वस्तु का विशेष ज्ञान। आज के युग के विज्ञान की उन्नति को देखकर संसार चकित हो गया है।

विज्ञान को विवेक का द्वार माना जाता है। अपने भौतिक सुखों के लिए ही मानव विज्ञान की शरण में आया है और विज्ञान मानव के लिए कल्पवृक्ष सिद्ध हुआ है। विज्ञान के बहुत से अद्भुत आविष्कारों को देखकर मनुष्य ने दाँतों तले ऊँगली दबा ली है। विज्ञान की चकाचौंध से मनुष्य स्तब्ध रह गया है।

विज्ञान और आधुनिक जीवन : विज्ञान और जीवन का घनिष्ट संबंध होता है। विज्ञान ने ही मानव जीवन को सुखमय बनाया है। किसी विद्वान् का कहना है कि विज्ञान ने अंधों को आँखें और बहरों को सुनने के लिए कान दिए हैं। उसने जीवन को दीर्घ बनाया है और डर को कम कर दिया है। विज्ञान ने पागलपन को वश में कर लिया है और रोगों का नाश किया है। जहाँ पर मनुष्य को विज्ञान से इतने सुख मिले हैं वहीं पर दुःख भी प्राप्त हुए हैं। विज्ञान को मानव के लिए वरदान भी माना गया है और अभिशाप भी।

विज्ञान वरदान के रूप में : विज्ञान ने मनुष्य को अनेक सुख प्रदान किये हैं। जीवन के प्रत्येक क्रियाकलाप में विज्ञान का योगदान रहा है। विज्ञान ने मनुष्य की कल्पनाओं को सच कर दिखाया है। विज्ञान ने भाप, अणुशक्ति को अपने वश में करके मनुष्य के जीवन में चार-चाँद लगा दिए हैं। विज्ञान ने हेलिकोप्टर, हवाई जहाज जैसे यंत्रों का आविष्कार करके मनुष्य के सुख को चर्म सीमा तक पहुँचा दिया है।

विज्ञान ने मनुष्य के मनोरंजन के अनेक साधन प्रदान किये हैं। विज्ञान ने टेलीविजन, रेडियो, फोन, ग्रामोफोन, सिनेमा का आविष्कार करके मनुष्य के जीवन को बहुत ही रोचक बनाया है। आज हम विज्ञान की वजह से घर बैठे दूर-दूर के समाचारों को सुन और देख सकते हैं। विदेश में हो रहे कार्यक्रमों को भी हम घर बैठे आराम से देख सकते हैं। जहाँ पर सिनेमा को मनोरंजन के लिए प्रयोग किया जाता है वहीं पर दूसरी ओर सिनेमा को शिक्षा के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है।

विज्ञान के चमत्कार : विज्ञान के आविष्कारों ने मनुष्य के जीवन को बहुत ही आनंदमय और रोचक बनाया है। लोग मशीनों के द्वारा ही पूरा काम खत्म कर लेते हैं। अन्न उगाने और कपड़ा बनाने के लिए मशीनों का प्रयोग किया जा रहा है। पहले लोग मिट्टी से बने दीपक जलाकर घरों में रोशनी किया करते थे लेकिन आज के लोग बटन दबाते हैं और घर जगमगाने लगता है।

चिकित्सा क्षेत्र में विज्ञान का उपयोग : विज्ञान ने चिकित्सा में उन्नति करके एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एक्स रे से शरीर के अंदर के चित्र ले लिए जाते हैं और दिल, गुर्दे, फेफड़े का ऑपरेशन किया जाता है। अंधों को दूसरों की आँखें देकर देखने के योग्य बनाया जाता है। कैंसर जैसे रोगों को समाप्त करने के लिए कोबाल्ट किरणों का आविष्कार किया जाता है।

विज्ञान अभिशाप के रूप में : लेकिन जब मनुष्य विज्ञान का गलत प्रयोग करने लगता है तो विज्ञान उसके लिए अभिशाप बन जाता है। जब मनुष्य को विज्ञान की भयानकता का पता चल जाता है तो मनुष्य का सारा उत्साह टूट जाता है। विज्ञान ने जिन आविष्कारों को मनुष्य के हित के लिए प्रयोग किया है वहीं पर उसके अहित के लिए भी प्रयोग किया है।

विज्ञान ने ऐटम बम और हाइड्रोजन बम बनाए हैं जिससे पूरा संसार एक ही पल में खत्म हो सकता है। जितना विनाश दूसरे विश्वयुद्ध में हुआ था उसकी पूर्ति विज्ञान सौ सालों में भी नहीं कर सकता है। हिरोशिमा और नागासाकी पर जो अणु बम्ब गिरे थे उनके परिणाम आज हमारे सामने हैं। बम्ब गिरने की वजह से वहाँ की संताने आज तक विकलांग पैदा होती हैं।

जब हम तीसरे विश्वयुद्ध की कल्पना करते हैं तो हमारा ह्रदय काँप उढ़ता है। विज्ञान के कारण ही प्रदुषण होता है। हवाई जहाजों से बम्ब गिराकर लोगों के घरों को तबाह कर दिया जाता है। विज्ञान से सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि इसने मनुष्य को बेकार बना दिया है। मशीनी युग के आ जाने से बहुत से लोगों की रोजी रोटी छिन गई है।

वैज्ञानिक प्रगति की वजह से ही मनुष्य की नैतिक धारणाएँ शिथिल हो गई हैं। हस्तकला में निपुण लोग मशीनों के अविष्कार से बेकार हो गये हैं। विज्ञान ने मनुष्य को शक्ति तो दी है पर शांति नहीं, सुविधाएँ तो दी हैं लेकिन सुख नहीं दिया है।

उपसंहार : विज्ञान तो बस एक शक्ति होती है। विज्ञान का मनुष्य सदुपयोग भी कर सकता है और दुरूपयोग भी। असल में जो विनाश हुआ था उसका जिम्मेदार हम विज्ञान को नहीं मान सकते वह तो निर्जीव होता है। विज्ञान का सदुपयोग करना है या दुरूपयोग यह बात मनुष्य पर ही निर्भर करती है।

विज्ञान तो मनुष्य का दास होता है। मनुष्य उसे जैसी आज्ञा देता है विज्ञान वैसा ही करता है। विज्ञान एक तलवार की तरह होता है जिससे किसी को बचाया भी जा सकता है और मारा भी जा सकता है। विज्ञान के प्रयोग को मनुष्य जाति के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए मनुष्य जाति के विनाश के लिए नहीं।

डॉ मनमोहन सिंह पर निबंध-Dr. Manmohan Singh in Hindi

डॉ मनमोहन सिंह पर निबंध-Essay On Dr. Manmohan Singh in Hindi

भूमिका : सरदार डॉ मनमोहन सिंह हमारे लोकप्रिय नेताओं में सर्वप्रमुख हैं। उन्हें भारत के प्रतिभासंपन्न प्रधानमंत्री माना जाता है। भारत राष्ट्र के प्रधानमंत्री होने की वजह से आज विश्व के नेताओं में उनका बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है।

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ होने के साथ-साथ वे एक गंभीर और समर्पित व्यक्ति भी हैं। डॉ मनमोहन सिंह जी में ज्ञान और योग्यता का अपार भंडार छिपा हुआ है उनसे कोई कुछ न कुछ सीख सकता है।

मनमोहन सिंह का जन्म : डॉ मनमोहन सिंह जी का जन्म 26 सितंबर 1932 को एक गाँव गाह में हुआ था। ये एक सरदार थे। इनके पिता का नाम गुरमुख सिंह और माता का नाम अमृत कौर है। जब इनके घर का बंटवारा हुआ था तब इन्हें अमृतसर के स्वांग मंडी के किशन सिंह संत राम के तबेले में भी रहना पड़ा था।

बाल्यकाल एवं परिवार : इनका विवाह 14 सितंबर 1958 को गुरशरण कौर से हुआ था। इनकी तीन बेटियाँ हैं। जब इनके पिता ने इनको कठिन परिश्रम करते हुए देखा तो इनके पिता ने कहा कि – मैं रहूँ या न रहूँ लेकिन तुम एक अच्छे प्रधानमंत्री जरुर बनोगे। उनके पिता की बातों को सच होने में लगभग तीस साल लगे थे। इस समय उनके पिता उनके साथ नहीं हैं लेकिन उनके आशीर्वाद से डॉ मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री बने गये हैं।

शिक्षा का सम्मान : इन्होने बी० ए० ऑनर्स की परीक्षा को स्थानीय हिन्दू कॉलेज से सन् 1952 में प्रथम श्रेणी से पास किया था। इन्होने एम० ए० ऑनर्स की परीक्षा को होशियार पुर के खालसा कॉलेज से सन् 1954 को प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण किया था। इन्होने केंब्रिज विश्व विद्यालय के रेनबरी स्कॉलर सन् 1969 से लेकर सन् 1971 को प्राप्त किया था।

इन्होने डी० फ़िल० और डी० लि० की उपाधियाँ ऑक्सफोर्ड विश्व विद्यालय और होनोरिस कौसा से प्राप्त की थीं। उन्होंने भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता पर पीएच० डी० की उपाधि प्राप्त की थी। इन्हें कैंब्रिज विश्व विद्यालय ने एडम स्मिथ पुरुस्कार से सन्  1965 को सम्मानित किया था।

भारत ने इन्हें पदम् विभुषण पुरस्कार से सन् 1987 में सम्मानित किया था। इन्हें साल के वित्तमंत्री के लिए युरोमनी पुरस्कार से  सन् 1993 में सम्मानित किया था। इन्हें एशिया के साल के वित्तमंत्री के रूप में एशिया मनी पुरस्कार से सन् 1993 और सन् 1994 में सम्मानित किया गया था।

मनमोहन सिंह की नौकरी : इन्होने पंजाब विश्व विद्यालय में अर्थशास्त्र के अध्यापक और रीडर के रूप में सन् 1957 से सन् 1965 तक काम किया था। इन्होने दिल्ली विश्वविद्यालय में भी अर्थशास्त्र के अध्यापक के रूप में सन् 1969 से सन् 1971 तक काम किया था।

इन्होने सन् 1976 में जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के मानद प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया था। इन्होने दिल्ली विश्वविद्यालय में भी मानद प्रोफ़ेसर के रूप में सन् 1996 में काम किया था। इन्होने प्रधानमंत्री बनने से पहले बहुत से पदों का दायित्व संभाला था।

प्रधानमंत्रित्व एक चुनौती : डॉ मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ 22 मई 2004 को ली थी। इस पद पर चुने जाने के बाद भी इनके सामने अपनी प्रतिभा और क्षमता को दिखाने के लिए अनेक विराट चुनौतियाँ थीं। उन सब को इन्होने बहुत ही ख़ुशी से निभाया था।

जिस समय पर सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री पद को ठुकराया था उस समय डॉ मनमोहन सिंह के विपक्ष दल के पास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो इस पद को सर्व संपत्ति के साथ स्वीकार कर सके। डॉ मनमोहन सिंह को दुबारा से प्रधानमन्त्री पद के लिए सन् 2009 को चुना गया था।

कुशल अर्थशास्त्री : डॉ मनमोहन सिंह को अर्थशास्त्र के रूप में लब्धब्द्ध माना जाता था। वे नर सिंह राव सरकार में भी सन् 1991 में वित्तमंत्री रहे थे। उन्ही की नीतियों पर चलने से अर्थव्यवस्था दृढता की ओर आगे बढ़ी थी।

आज के समय में देश जिस दौर से गुजर रहा है उसमें हमे प्रधानमंत्री के रूप में ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो राजनीति के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को भी समझ सके। डॉ मनमोहन सिंह इस कसौटी पर खरे उतरे थे।

अंतर्मुखी व्यक्तित्व : दुनिया की नजर में प्रधानमंत्री पद का दायित्व राजनितिक एवं सार्वजनिक दृष्टि से देखा जाये तो बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें प्रधानमंत्री को अपनी राजनितिक पारी में स्वभावगत संकोचों को दूर करके जनता के समक्ष अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करनी चाहिए। यह ख़ुशी की बताई की अब वे अपनी अंतर्मुखी और संकोची स्वभाव को दूर करके बहुत से मंचों के द्वारा अपनी बात को निडरता से रख रहे हैं और साथ ही साथ जनता क साथ संवाद भी स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।

समस्याओं से निबटने का साहस : जब प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने सत्ता की बागडोर संभाली तभी जनता को सूखा , बाढ़ , बढती मुद्रा स्फीति दर ,ट्रक हड़ताल , विवाद ,बंधक संकट जैसी बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ा था।

इसके बाद देरी से राजनीति में प्रवेश करने की वजह से अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। इसी काम में उनका अर्थशास्त्री का रूप सामने आता है क्योंकि वे छोटी-से-छोटी जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करते थे।

विनम्र एवं संवेदन शील : डॉ मनमोहन सिंह जी विनम्र, उदार और संवेदनशीलता से धनी व्यक्ति है। मनमोहन जी का विश्वास सादा जीवन उच्च विचार में था। वे एक साधारण वेशभूषा में भी बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व रखते हैं। इतने बड़े पद पर काम करने पर भी घमंड उनके पास भी नहीं फटका। इतने पदों पर सम्मानित होते हुए भी परिवार के प्रति उनकी जिम्मेदारियाँ कम नहीं हुई हैं।

उपसंहार :- भारत की जनता को अपने इस सपूत से बहुत आशाएं हैं। हम लोग यह आशा करते हैं की डॉ मनमोहन जी के नेतृत्व में यह देश लगातार आगे बढ़ता रहेगा। भगवान इन्हें लम्बी उम्र और स्वास्थ्य प्रदान करे।

कल्पना चावला पर निबंध-Kalpana Chawla Essay In Hindi

कल्पना चावला पर निबंध :

भूमिका : भारत को महान पुरुषों और महिलाओं की भूमि कहा जाता है। भारत में अनेक विभूतियों ने जन्म लेकर संसार में भारत के नाम को उज्ज्वल किया है। कल्पना चावला उन्हीं में से एक थी। आज के वैज्ञानिक इतिहास में उनका नाम हमेशा सुनहरे अक्षरों में लिखा जायेगा। वे पूरे भारत की पहली अंतरिक्ष महिला थीं। उनका नाम पूरे भारत में सम्मान से लिया जाता है।

छोटी-सी उम्र से ही वे तारों के पास जाने की इच्छा रखती थीं। स्कूल में पढ़ते समय वे अंतरिक्ष और चाँद-सितारों के चित्र बहुत ही शोक से बनाया करती थीं। उनका सपना सच्च हुआ उन्होंने दो बार अंतरिक्ष की यात्रा की थी। अंतरिक्ष में जाना कल्पना चावला का एकमात्र लक्ष्य था लेकिन उन्हें शास्त्रीय संगीत से बहुत ही गहरा लगाव था।

जन्म एवं शिक्षा : कल्पना चावला का जन्म हरियाणा के करनाल नगर में हुआ था। उनका जन्म 17 मार्च, 1962 को हुआ था। इनके पिता का नाम बनारसीदास चावला था और माता का नाम श्रीमती संयोगिता देवी चावला था। इनका पूरा नाम कल्पना जीन पियरे हैरिसन था। कल्पना चावला की दो बहने और एक भाई था।

वे अपने परिवार की सबसे छोटी सदस्य थीं। उन्होंने अपनी बाल शिक्षा को करनाल के टैगोर बाल निकेतन स्थानीय विश्व विद्यालय से प्राप्त की थी। जब उन्होंने दसवी की परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया तब उन्होंने प्री-इंजीनियरिंग को दयाल सिंह नामक स्थानीय कॉलेज से प्राप्त की थी। उन्होंने वैमानिक इंजीनियरिंग की परीक्षा पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से की थी।

कल्पना चावला ने एम० एस-सी० की परीक्षा को उत्तीर्ण करने के उद्देश्य से अमेरिका में टेक्सास विश्व विद्यालय में दाखिला लिया था। उनका विवाह 2 दिसंबर, 1983 को ज्यां पियरे हैरिस से हुआ था। अपने दोस्तों और पति से प्रेरणा लेकर उनकी रूचि अंतरिक्ष में और अधिक बढने लगी।

अंतरिक्ष विज्ञान की शिक्षा : कल्पना चावला को बचपन से ही अंतरिक्ष के मॉडल और चित्र बनाना बहुत पसंद था। उनके मन में बचपन से ही अंतरिक्ष में जाने का संकल्प था। कल्पना चावला ने लाईसेंस बनवाने के बाद कलाबाजी उडान भी सीखी थी। कल्पना चावला के कैरियर की शुरुआत नासा एमेस शोध के केंद्र से हुई थी। वहाँ पर उन्होंने शोध वैज्ञानिक के रूप में काम किया था। वहाँ पर एक वर्ष तक कड़ा परिश्रम करने के बाद उन्हें अंतरिक्ष की उड़न के लिए चुना गया था।

प्रथम सफल अंतरिक्ष उड़ान : कल्पना चावला को 15वें उम्मीदवार के रूप में जॉनसन स्पेस सैंटर भेजा गया था। उसके बाद उन्होंने अपने कदमों को पीछे नहीं हटने दिया। उन्होंने 1996 में बहुत उन्नति प्राप्त की और मिशन विशेषज्ञ का दर्जा प्राप्त किया। आखिर में 19 नवम्बर, 1997 में उन्होंने कोलम्बिया अंतरिक्ष यान से अपनी पहली उडान को शुरू किया था। जब उन्होंने अपनी पहली उडान को सफल कर लिया था तब उनके चेहरे पर सफलता की खुशी झलक रही थी। इसके बाद उन्होंने अपना सारा जीवन अंतरिक्ष को सौंप दिया था।

दूसरी और अंतिम उडान : दूसरी बार कल्पना चावला को कोलंबिया की शुद्ध उडान के लिए चुना गया। इस उडान में उनके साथ और छ: वैज्ञानिक यात्री भी थे। वे अंतरिक्ष में 16 जनवरी, 2003 को गयीं थीं। जब वे 1 फरवरी, 2003 को अंतरिक्ष से वापस लौट रहीं थीं तो उनका विमान कोलंबिया किसी वजह से दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।

विस्फोट के समय कल्पना चावला और उनके छ: साथी उनके साथ भगवान को प्रिय हो गये थे। कल्पना ने इस उडान में 760 घंटे अंतरिक्ष में बिताये थे और पृथ्वी के 252 चक्कर भी काटे थे। उनकी मृत्यु एक वीर नायिका की भांति हुई थी इसी कारण से भारत में उन्हें राष्ट्रीय नायिका की उपाधि मिली थी।

उपसंहार : उन्हें अमेरिका की नागरिकता की प्राप्ति होने के बाद भी वे अपने देश से अत्यधिक प्रेम करती थीं। उन्हें टैगोर बाल निकेतन विद्यालय से बहुत प्रेम था। इसी वजह से हर साल इस विद्यालय से दो विद्यार्थी नासा के लिए आमंत्रित किये जाते हैं।

बच्चों को संदेश देते हुए कल्पना चावला ने कहा था कि भौतिक लाभों को ही प्रेरणा के स्त्रोत नहीं मानना चाहिए। इन्हें तो आप आगे भी हासिल कर सकते हैं। मंजिल तक पहुंचने का रास्ता खोजना चाहिए। यह जरूरी नहीं होता कि सबसे छोटा रास्ता सबसे अच्छा हो। मंजिल तक पहुंचने का सफर भी बहुत अहमियत रखता है।

बसंत ऋतु पर निबंध-Essay On Basant Ritu In Hindi

बसंत ऋतु पर निबंध :

भूमिका : भारत को अनेक ऋतुओं का देश माना जाता है। भारत में सर्दी-गर्मी, बरसात-पतझड़, वसंत-ग्रीष्म आदि छ: ऋतुएँ आती जाती रहती हैं। साल में आने वाली बसंत ऋतु सबकी प्रिय होती है। बसंत ऋतु के आने पर पूरा प्राणी जगत हर्ष और उल्लास से झूम उठता है। बसंत ऋतुओं का राजा होती है इसी वजह से इसे ऋतुराज बसंत के नाम से जाना जाता है।

ऋतुओं का राजा :- भारत की प्रसिद्धि का कारण उसकी प्राकृतिक शोभा होती है। लोग अपने आप को धन्य मानते हैं जो इस पृथ्वी पर रहते हैं। ये ऋतुएँ एक-एक करके आती हैं और भारत माता का श्रृंगार करती हैं और चली जाती है। सभी ऋतुओं की अपनी-अपनी शोभा होती है। लेकिन बसंत ऋतु की शोभा सबसे निराली होती है। बसंत ऋतु का ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ स्थान होता है इसी वजह से यह ऋतुओं की राजा मानी जाती है।

बसंत ऋतु की विशेषता :- बसंत के समय में ऋतु बहुत सुहावनी होती है। सर्दी खत्म और गर्मी शुरू होने वाली होती हैं। इस समय में न ही तो ज्यादा सर्दी होती है और न ही ज्यादा गर्मी होती है। प्रत्येक व्यक्ति बाहर घूमने का इच्छुक होता है। यह इस मीठी ऋतु की विशेषता होती है। सब जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों में नव जीवन का संचार हो जाता है।

वृक्षों के नए-नए पत्ते लद जाते हैं। फूलों का सौंदर्य और हरियाली की छटा मन को भा जाती है। आमों के पेड़ों पर बौर आने लगता है और कोयल भी मीठी आवाज में कुहू-कुहू करने लगती है। इस सुगंधित वातावरण में सैर करने से बहुत सी बीमारियाँ  दूर हो जाती है। ठंडी-ठंडी हवा चलती रहती है जिससे मनुष्य की उम्र और बल में वृद्धि होती है। बसंत ऋतु पतझड़ और शिशिर के बाद आती है।

देखा जाये तो बसंत फाल्गुन मास से ही शुरू हो जाती है। इसके वास्तविक महीने चैत्र और बैसाख होते हैं। 15 फरवरी से लेकर 15 अप्रैल तक का समय बसंत ऋतु का ही होता है। बसंत ऋतु में मौसम बहुत सुहावना होता है। प्रकृति में चारों ओर बसंत का प्रभाव दिखाई देने लगता है।

बसंत ऋतु का स्वागत :- बसंत के आगमन पर नई फसलें पकने लगती हैं। सरसों के पीले-पीले फूल खिल-खिला कर खुशी व्यक्त करते हैं। सिट्टे भी ऐसे लगते हैं जैसे सिर उठाकर ऋतुराज का स्वागत कर रहे हों।

सरोवरों में कमल के फूल खिल कर इस तरह पानी को छिपा लेते हैं जैसे मनुष्यों को संकेत देते हैं कि अपने मन को खोल कर हंसों और सारे दुखों को मन में समेट लो। आसमान में पक्षी किलकारियां मारकर बसंत का स्वागत करते हैं।

प्राणी जगत में उल्लास :- प्राणी जगत में इस ऋतु के आने से उल्लास और उमंग का संचार होता है। पशु-पक्षी जोश, उत्साह और उल्लास से भर जाते हैं। कोयल अपने मधुर स्वर से गीत गाती है जो पूरी अमराईयों में गूंजता है। मनुष्य जाती उमग से भरकर नाचने लगती है। किसान का मन अपनी फसल को देखकर खुशी से भर जाता है।

कवि और कलाकार इस ऋतु से प्रभावित होकर नई कविताएँ बनाते हैं। इस ऋतु का सबसे अच्छा प्रभाव मनुष्य के स्वास्थ्य पर पड़ता है। शरीर में नए रक्त का संचार होता है और स्वास्थ्य में उन्नति होती है। बसंत ऋतु के आने से दिशाएं साफ हो जाती हैं और आसमान निर्मल हो जाता है।

चारों ओर प्रसन्नता से जड़ में भी चेतना आ जाती है। सूर्य भी अधिक तीव्र नहीं होता हैं। दिन रात एक जैसे होते हैं। बसंत ऋतु में हवा दक्षिण से उत्तर की तरफ बहती है। दक्षिण से आने वाली हवा शीतल, मंद और मतवाली होती है।

बसंत पंचमी :- बसंत पंचमी को ऋतुराज के आगमन में उत्सव के रूप में मनाया जाता है। बसंत पंचमी के दिन लोग खेलते हैं झूला झूलते हैं और अपनी प्रसन्नता को व्यक्त करते हैं। हर घर में वसंती हलवा, केसरिया खीर बनते हैं। इस दिन लोग पीले रंग के वस्त्र पहनते हैं और बच्चे पीले रंग के पतंग उड़ाते हैं।

फाल्गुन की पंचमी को बसंत पंचमी का मेला लगता है। इस दिन लोग सुबह से लेकर शाम तक पतंगें उड़ाते रहते हैं। होली को भी बसंत ऋतु का ही त्यौहार माना जाता है। इस दिन सारा वातावरण रंगीन हो जाता है और सभी आनंद से मगन होते हैं।

बसंत ऋतु की ऐतिहासिकता :- बसंत पंचमी के दिन ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का जन्म हुआ था। इस दिन सरस्वती पूजन किया जाता है। इसी दिन वीर हकीकत राय की भी मृत्यु हुई थी। वीर हकीकत राय के कारण इस दिन का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है।

वीर हकीकत राय जी का बलिदान हमें अपने धर्म पर अडिग रहने का संदेश देता है। हमें सभी धर्मों से प्रेरणा लेनी चाहिए और किसी भी धर्म के प्रति नफरत नहीं रखनी चाहिए। वीर हकीकत राय जी की याद में हर साल मेला लगता है। इस दिन वीर हकीकत राय जी को श्रद्धांजली दी जाती है।

उपसंहार :- हमें इस ऋतु में अपना स्वास्थ्य बनाना चाहिए। सुबह-सुबह उठकर घूमने जाना चाहिए और प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लेना चाहिए। वसंत ऋतु ईश्वर का एक वरदान है और हमे इस अवसर का पूरा लाभ उठाना चाहिए।

नैतिक शिक्षा पर निबंध-Essay on The Inevitability of Moral Education in Hindi

नैतिक शिक्षा पर निबंध :

भूमिका : मनुष्य जन्म से ही सुख और शांति के लिए प्रयत्न करता है। जब से सृष्टि का आरंभ हुआ है वो तभी से ही अपनी उन्नति के लिए प्रयत्न करता आ रहा है लेकिन उसे पूरी तरह शांति सिर्फ शिक्षा से ही मिली है। शिक्षा के अस्त्र को अमोघ माना जाता है। शिक्षा से ही मनुष्य की सामाजिक और नैतिक उन्नति हुई थी और वह आगे बढने लगा था।

मनुष्य को यह अनुभव होने लगा कि वह पशुतुल्य है। शिक्षा ही मनुष्य को उसके कर्तव्यों के बारे में समझाती है और उसे सच्चे अर्थों में इंसान बनाती है। उसे खुद का और समाज का विकास करने का भी अवसर देती है।

अंग्रेजी शिक्षण पद्धति का प्रारंभ : मनुष्य की सभी शक्तियों के सर्वतोन्मुखी विकास को ही शिक्षा कहते हैं। शिक्षा से मानवीय गरिमा और व्यक्तित्व का विकास होता है। नैतिक शिक्षा का अर्थ होता है कि बच्चे की शारीरिक, मानसिक और नैतिक शक्तियों का सर्वतोन्मुखी विकास हो। यह दुःख की बात है कि शिक्षा भारत में अंग्रेजी की विरासत है।

अंग्रेज भारत को अपना उपनिवेश मानते थे। अंग्रेजों ने भारतीयों को क्लर्क और मुंशी बनाने की चाल चली। उन्हें यह विश्वास था कि इस शिक्षा योजना से एक ऐसा शिक्षित वर्ग बनेगा जिसका रक्त और रंग तो भारतीय होगा लेकिन विचार, बोली और दिमाग अंग्रेजी होगा।

इस शिक्षा प्रणाली से भारतीय केवल बाबू ही बनकर रह गये। अंग्रेजों ने भारतीय लोगों को भारतीय संस्कृति से तो दूर ही रखा लेकिन अंग्रेजी संस्कृति को उनके अंदर गहराई से डाल दिया। यह दुःख की बात है की स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद भी अब तक अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व बना हुआ है।

प्राचीन शिक्षा पद्धति : प्राचीन काल में भारत को संसार का गुरु कहा जाता था। भारत को प्राचीन समय में सोने की चिड़िया कहा जाता था। प्राचीन समय में ऋषियों और विचारकों ने यह घोषणा की थी कि शिक्षा मनुष्य वृत्तियों के विकास के लिए बहुत आवश्यक है। शिक्षा से मानव की बुद्धि परिष्कृत और परिमार्जित होती है।

शिक्षा से मनुष्य में सत्य और असत्य का विवेक जागता है। भारतीय शिक्षा का उद्देश्य मानव को पूर्ण ज्ञान करवाना, उसे ज्ञान के प्रकाश की ओर आगे करना और उसमें संस्कारों को जगाना होता है। प्राचीन शिक्षा पद्धति में नैतिक शिक्षा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है।

पुराने समय में यह शिक्षा नगरों से दूर जंगलों में ऋषियों और मुनियों के आश्रमों में दी जाती थी। उस समय छात्र पूरे पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करते थे और अपने गुरु के चरणों की सेवा करते हुए विद्या का अध्ययन करते थे।

इन आश्रमों में छात्रों की सर्वंगीण उन्नति पर ध्यान दिया जाता था। उसे अपनी बहुमुखी प्रतिभा में विकास करने का अवसर मिलता था। विद्यार्थी चिकित्सा, नीति, युद्ध कला, वेद सभी विषयों सम्यक होकर ही घर को लौटता था।

नैतिक शिक्षा का अर्थ : नैतिक शब्द नीति में इक प्रत्यय के जुड़ने से बना है। नैतिक शिक्षा का अर्थ होता है- नीति संबंधित शिक्षा। नैतिक शिक्षा का अर्थ होता है कि विद्यार्थियों को नैतिकता, सत्यभाषण, सहनशीलता, विनम्रता, प्रमाणिकता सभी गुणों को प्रदान करना।

आज हमारे स्वतंत्र भारत में सच्चरित्रता की बहुत बड़ी कमी है। सरकारी और गैर सरकारी सभी स्तरों पर लोग हमारे मनों में विष घोलने का काम कर रहे हैं। इन सब का कारण हमारे स्कूलों और कॉलेजों में नैतिक शिक्षा का लुप्त होना है।

मनुष्य को विज्ञान की शिक्षा दी जाती है उसे तकनीकी शिक्षण भी दिया जाता है लेकिन उसे असली अर्थों में इंसान बनना नहीं सिखाया जाता है। नैतिक शिक्षा ही मनुष्य की अमूल्य संपत्ति होती है और इस संपत्ति के आगे सभी संपत्ति तुच्छ होती हैं। इन्हीं से राष्ट्र का निर्माण होता है और इन्हीं से देश सुदृढ होता है।

नैतिक शिक्षा की आवश्यकता : शिक्षा का उद्देश्य होता है कि मानव को सही अर्थों में मानव बनाया जाये। उसमें आत्मनिर्भरता की भावना को उत्पन्न करे, देशवासियों का चरित्र निर्माण करे, मनुष्य को परम पुरुषार्थ की प्राप्ति कराना है लेकिन आज यह सब केवल पूर्ति के साधन बनकर रह गये हैं। नैतिक मूल्यों का निरंतर ह्रास किया जा रहा है।

आजकल के लोगों में श्रधा जैसी कोई भावना ही नहीं बची है। गुरुओं का आदर और माता-पिता का सम्मान नहीं किया जाता है। विद्यार्थी वर्ग ही नहीं बल्कि पूरे समाज में अराजकता फैली हुई है। ये बात खुद ही पैदा होती है कि हमारी शिक्षण व्यवस्था में आखिरकार क्या कमी है।

कुछ लोग इस बात पर ज्यादा बल दे रहे हैं कि हमारी शिक्षा प्रणाली में नैतिक शिक्षा के लिए भी जगह होनी चाहिए। कुछ लोग इस बात पर बल दे रहे हैं कि नैतिक शिक्षा के बिना हमारी शिक्षा प्रणाली अधूरी है।

उपसंहार : आज के भौतिक युग में नैतिक शिक्षा बहुत ही जरूरी है। नैतिक शिक्षा ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है।  नैतिक शिक्षा से ही राष्ट्र का सही अर्थों में निर्माण होता है। नैतिक गुणों के होने से ही मनुष्य संवेदनीय बनता है। आज के युग में लोगों के सर्वंगीण विकास के लिए नैतिक शिक्षा बहुत ही जरूरी है। नैतिक शिक्षा से ही कर्तव्य निष्ठ नागरिकों का विकास होता है।