यदि मैं पुलिस अधिकारी होता पर निबंध

यदि मैं पुलिस अधिकारी होता पर निबंध :

भूमिका : हर बालक या व्यक्ति के मन में अपने सपनों को पूरा करने की इच्छा जन्म लेती है। हर किसी की अपनी महत्वकांक्षाएं होती हैं। अगर कोई व्यापारी बनना चाहता है तो कोई कर्मचारी बनना चाहता है। कोई नेता बनकर राजनीति में बैठना चाहता है तो कोई समाज सेवा का काम करना चाहता है। कोई अधिकारी बनकर प्रशासन बनने की सोचता है तो कोई इंजीनियर या डॉक्टर बनने की इच्छा रखता है।

मेरी अभिलाषा : मैं भी एक अभिलाषा रखता हूँ और इस अभिलाषा पर मैं बहुत ही गंभीरता से सोच विचार करता हूँ। यह बात भविष्य पर निर्भर करती है कि मेरी इच्छा पूरी होगी या नहीं लेकिन मैं अपने निश्चय पर दृढ हूँ। मैं एक पुलिस अधिकारी बनना चाहता हूँ। मेरे चाचा जी भी पुलिस में डी० सी० पी० के पद पर थे।

उन्होंने बहुत से जोखिम भरे काम किये थे। जब भी वे उन जोखिम भरे कामों के बारे में बताया करते थे तो मेरा उत्साह बढ़ जाता था। उन्होंने डाकुओं से लड़ते समय अपने प्राण दिए थे और पुलिस का गौरव बढ़ाया था। चाचा जी का आदर्श मुझे इसी पथ पर आगे चलने की प्रेरणा देता है। मेरे मन में समाज और राष्ट्र का भी भाव है।

पुलिस तंत्र में सुधार : मैं विश्वास रखता हूँ कि अगर पुलिस ईमानदारी से अपना काम करे तो वे समुचित तरीके से समाज की सेवा कर सकते हैं। पुलिस व्यवस्था में अनेक सुधार करके पुलिस व्यवस्था को सबसे अधिक बहतरीन बनाया जा सकता है।

पुलिस खुद को जनता का सेवक समझे और बिना किसी कारण से किसी पर भी अत्याचार न करे। वह उनके गुनहगार और बेगुनहा होने का पता लगाये तब आगे की कार्यवाही करे। अपनी व्यवस्था के प्रति ईमानदार होकर पुलिस को गौरव प्राप्त हो सकता है।

वर्तमान स्थिति : मैं इस बात को जनता हूँ कि आज का पुलिस विभाग भ्रष्ट हो चुका है। आजकल लोग पुलिस को नफरत की नजर से देखते हैं। आजकल लोग पुलिस को रक्षक नहीं भक्षक मानते हैं। पुलिस खुद को जनता का सेवक नहीं समझती है।

पुलिस जनता पर बिना किसी कारण के डंडे बरसाना और उन पर अत्याचार करना अपना कर्तव्य समझती है। पुलिस वाले गुंडों और अपराधियों की सहायता करते हैं। आजकल पुलिस बेकसूर को सजा दिलवाकर अपने स्वार्थ को पूरा करती है। पुलिस को शांति नहीं अशांति का सूचक माना जाता है।

भविष्य : पुलिस व्यवस्था का भ्रष्ट होना मुझे उससे दूर जाने की अपेक्षा उसके समीप जाने के लिए प्रेरित करता है। जब मैं पुलिस का एक भाग बन जाउँगा तभी मैं इस व्यवस्था में परिवर्तन ला सकता हूँ। मैं पुलिस अधिकारी बनकर पुलिस विभाग की खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस से स्थापित कर पाउँगा।

पुलिस का कर्त्तव्य समाज की सेवा और उसका मार्गदर्शन करना होता है। खुद अनुशासित रहकर दूसरों को अनुशासन में रहने का पाठ पढ़ाना चाहिए। पुलिस को अपराध की खोज के लिए मनोवैज्ञानिक की सूझ-बुझ से काम करना चाहिए। धैर्य से जनता की शिकायतें सुननी चाहिए और उन्हें दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।

उपसंहार : अत: जब मैं पुलिस अधिकारी बन जाउँगा तब मैं पुलिस के सारे कर्तव्यों को पूरा करूंगा जो एक पुलिस अधिकारी के जनता के प्रति होते हैं। मैं अपने चाचा से प्रेरित होकर देश की सेवा करूंगा और अपने देश की पुलिश का गौरव बढाऊँगा।

प्रातःकाल का भ्रमण पर निबंध-Paragraph On Morning Walk In Hindi

प्रातःकाल का भ्रमण पर निबंध :

भूमिका : व्यक्ति को सबसे पहले अपने स्वास्थ्य की सुरक्षा करनी चाहिए क्योंकि व्यक्ति के बहुत से कर्त्तव्य होते हैं। इन कर्त्तव्यों को बिना अच्छे स्वास्थ्य के पूरा नहीं किया जा सकता है। स्वास्थ्य की रक्षा के अनेक साधन होते हैं। प्रातःकाल के भ्रमण का इन साधनों में बहुत महत्व है।

प्रातः काल का दृश्य दिन के सभी दृश्य के मुकाबले में अधिक मनोहर और मन मोह लेने वाला होता है। रात के बाद जब उषा की मधुर मुस्कान उत्पन्न होती है वो हमारे ह्रदय को जीत लेने वाली मुस्कान होती है। धरती के कण-कण में नया उल्लास और उमंग छा जाती है। ऐसे समय में भ्रमण करना बहुत ही लाभकारी होता है।

प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ समय : प्रकृति प्रातः काल सभी जीवों को स्वास्थ्य का वरदान देती है। अलग-अलग ऋतुओं की सुगंध वाली वायु भी उसी समय चलना शुरू होती है। चारों ओर आनंद छाया होता है। खुशबू से भरे खिलखिलाने वाले फूल बहुत ही मोहक लगते हैं। जो फूल बेलों से झड़ते हैं उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे वे धरती का श्रृंगार कर रहे हों।

चारों ओर हरियाली को देखकर मन मस्ती से भर जाता है। पक्षियों का चहचहाना मन को बहुत ही प्रसन्नता देता है। प्रातः काल का सूर्य और अस्त होता हुआ सूर्य ऐसा लगता है जैसे भगवान की दो आँखें आँख-मिचौली खेल रही हो। जो मनुष्य ऐसे समय में भ्रमण करता है उसका स्वास्थ्य ही नहीं अपितु उसकी आयु भी दीर्घ होती है।

प्रातःकाल के भ्रमण के लाभ : प्रातः काल का भ्रमण करने से मनुष्य के शरीर में फुर्ती के साथ-साथ नए जीवन का भी संचार होता है। हमारा मन अनेक प्रकार की खुशियों से भर जाता है। पूरे दिन काम करने से भी व्यक्ति थकता नहीं है। पूरे दिन मुंह पर तेज सा छाया रहता है। साफ हवा से रक्त भी साफ होता है। फेफड़ों को भी बल मिलता है।

जब बूंदों से सजी घास पर नंगे पैरों से चलते हैं तो दिमाग के सभी रोग ठीक हो जाते हैं। मनुष्य के शरीर में बुद्धि, तेज और यश की वृद्धि होती है। मनुष्य में परिश्रम और साहस की शक्ति आ जाती है। व्यक्ति के दो शत्रु होते हैं- आलस्य और काम। जो लोग प्रातः काल का भ्रमण करते हैं उन लोगों के पास ये दोनों फटकते भी नहीं हैं।

प्रातः काल का भ्रमण की हानियाँ : आजकल सभी लोग बैठकर काम करते हैं। सभी लोग सुबह से लेकर शाम तक बैठकर ही काम करते हैं। मनुष्य शरीर से परिश्रम बिलकुल भी नहीं करता है। शरीर के जिस भाग से काम नहीं किया जाता है वो नाकारा हो जाता है।

जब मनुष्य प्रातः काल का भ्रमण करता है तो उसके शरीर का हर भाग हरकत करने लगता है। जो लोग बुद्धिजीवी होते हैं उनके चेहरे पीले और शरीर क्षीण दिखता है। व्यापारी, विद्यार्थी, अध्यापक, दफ्तर के क्लर्क ये सभी बुद्धिजीवी होते हैं। इसी कारण आजकल प्रातः काल का भ्रमण जरूरी होता है।

प्रातः काल का भ्रमण की आवश्यकता : जो मनुष्य आज सभ्य और शिक्षित कहलाता है वो बिस्तर से तब उठता है जब धूप आधे आकाश में आ जाती है। वह चाय भी बिस्तर पर ही पीता है। इन सब का परिणाम उसके स्वास्थ्य पर पड़ता है वह चिडचिडा हो जाता है और उसके निर्णय करने की शक्ति क्षीण हो जाती है। लेकिन जो लोग प्रातः काल का भ्रमण करते हैं वे स्वस्थ और हंसते हुए दिन को बिताते हैं।

उपसंहार : प्रातः काल में भ्रमण न करने से हमारे स्वास्थ्य को बहुत बड़ा नुकसान होता है लेकिन प्रातः काल का भ्रमण करने से हमें स्वस्थ रहने का वरदान मिलता है। हमें प्रातः काल के भ्रमण की आदत डाल लेनी चाहिए यह हमारे शरीर के लिए बहुत ही लाभकारी होती है।

परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध-Hindi Nibandh

परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध :

भूमिका : हर वर्ष करोड़ों की संख्या में विद्यार्थी बोर्ड की परीक्षा देते हैं। स्कूलों व् कोलेजों में बहुत प्रकार की परीक्षाएं आयोजित करवाई जाती हैं। अगर किसी अच्छे स्कूल या कॉलेज में दाखिला लेना हो तो परीक्षा देनी पडती है, किसी प्रकार की नौकरी प्राप्त करनी हो तो परीक्षा देनी पडती है, किसी कोर्स का दाखिला लेना हो तो परीक्षा देनी पडती है।

परीक्षाओं के अनेक रूप होते हैं। लेकिन हम केवल एक ही परीक्षा से परिचित हैं जो कि लिखित रूप से कुछ प्रश्नों के उत्तर देने से पूरी होती है। खुदा ने अब्राहम की परीक्षा ली थी। परीक्षा के नाम से फरिश्ते घबराते हैं पर मनुष्य को बार-बार परीक्षा देनी पडती है।

परीक्षा क्या है : परीक्षा को वास्तव में किसी की योग्यता, गुण और सामर्थ्य को जानने के लिए प्रयोग किया जाता है। शुद्ध-अशुद्ध अथवा गुण-दोष को जांचने के लिए परीक्षा का प्रयोग किया जाता है। हमारी शिक्षा प्रणाली का मेरुदंड परीक्षा को माना जाता है। सभी स्कूलों और कॉलेजों में जो कुछ भी पढ़ाया जाता है उसका उद्देश्य विद्यार्थियों को परीक्षा में सफल कराना होता है।

स्कूलों में जो सामान्य रूप से परीक्षा ली जाती हैं वह वार्षिक परीक्षा होती है। जब वर्ष के अंत में परीक्षाएं ली जाती हैं तब उनकी उत्तर पुस्तिका से उनकी क्षमता का पता चलता है। विद्यार्थियों की योग्यता को जांचने के लिए अभी तक कोई दूसरा उपाय नहीं मिला है इस लिए वार्षिक परीक्षा से ही उनकी योग्यता का पता लगाया जाता है। परीक्षाओं से विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति को भी जांचा जा सकता है।

परीक्षा का वर्तमान स्वरूप : तीन घंटे से भी कम समय में विद्यार्थी पूरी साल पढ़े हुए और समझे हुए विषय को हम कैसे जाँच -परख सकते हैं? जब प्रश्न-पत्रों का निर्माण वैज्ञानिक तरीके से नहीं होता तो विद्यार्थियों की योग्यता को जांचना त्रुटिपूर्ण रह जाता है। जब परीक्षा के भवन में नकल की जाती है तो परीक्षा-प्रणाली पर एक प्रश्न चिन्ह लग जाता है। प्रश्न पत्रों का लीक हो जाना आजकल आम बात हो गई है। हमारी परीक्षा-प्रणाली की विश्वसनीयता लगातार कम होती जा रही है।

नकल क्यूँ : जिस प्रकार राम भक्त हनुमान को राम का ही सहारा रहता था उसी तरह कुछ बच्चों को बस नकल का ही सहारा रहता है। पहले समय में बच्चों को नकल करने के लिए कला का सहारा लेना पड़ता था लेकिन आजकल तो अध्यापक ही बच्चों को नकल करवाने के लिए चारों तरफ फिरते रहते हैं।

नकल करना और करवाना अब एक पैसा कमाने का माध्यम बन गया है। अगर नकल करवानी है तो माता-पिता के पास धन होना जरूरी हो गया है। कुछ विद्यार्थी दूसरों के लिए आज भी नकल करवाने और चिट बनाने का काम करते रहते हैं। बहुत से विद्यार्थी तो ब्लू-टूथ और एस० एम० एस० के द्वारा भी नकल करते रहते हैं। बच्चों के मूल्यांकन में भी बहुत गडबडी होने लगी है।

नकल के लिए सुझाव : कोई भी परीक्षा प्रणाली विद्यार्थी के चरित्र के गुणों का मूल्यांकन नहीं करती है। जो लोग चोरी करते हैं हत्याएँ करते हैं वे भी जेलों में बैठकर परीक्षा देते और प्रथम श्रेणी प्राप्त करते हैं। जो परीक्षा प्रणाली केवल कंठस्थ करने पर जोर देती है वो विद्यार्थियों की योग्यता का मूल्यांकन नहीं कर सकती। सतत चलने वाली परीक्षा प्रणाली की स्कूलों और कॉलेजों में विकसित होने की जरूरत है। विद्यार्थी के ज्ञान, गुण और क्षमता का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

उपसंहार : आजकल बहुत से लोगों को परीक्षाएं देनी पडती हैं। अगर आपको कोई भी कार्य करना है तो पहले आपको परीक्षा देनी पडती है। कुछ लोग परीक्षा देने के परिश्रम से बचने के लिए नकल करते हैं तो कुछ लोग पैसे देकर नकल करते हैं लेकिन ऐसा कब तक चलेगा। आगे चलकर जब उन्हें कोई व्यवसायिक कार्य या फिर नौकरी पाने के लिए फिर भी परीक्षा देनी ही पड़ेगी तब वे क्या करेंगे?

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना पर निबंध

जहाँ सुमति तहं संपत्ति नाना पर निबंध :

भूमिका : व्यक्ति ने प्राचीन काल से बहुत परिश्रम किया है। उसने परिश्रम करके अपने आप को सबसे अधिक शक्तिशाली और श्रेष्ठ बनाया है। आज तक उसने दूसरे लोगों पर अपने बल और बुद्धि से शासन किया है। प्राचीनकाल में अंग्रेजों ने भारत पर अपनी बुद्धि के बल पर शासन किया था। लोग बुद्धि से असंभव कार्य को भी संभव कर सकते हैं। लोगों ने बुद्धि के बल पर ही नए-नए आविष्कार किये जिससे आधुनिक युग का निर्माण हुआ।

बुद्धि और ज्ञान का समंवय : व्यक्ति विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। व्यक्ति ने संसार में अपनी बुद्धि और ध्यान से अन्य प्राणियों में सर्वश्रेष्ठता प्राप्त की है। उसने जो कुछ भी प्राप्त किया है वो सब कुछ अपनी बुद्धि से प्राप्त किया है। जहाँ पर बुद्धि होती है वहाँ पर सुख और संपत्ति का होना निश्चित है।

व्यक्ति ने अपनी बुद्धि को चर्म सीमा पर ले जाकर ईश्वर रूप को भी प्राप्त किया है। व्यक्ति का एक नाम मनुष्य भी होता है। भगवान अपने सौंदर्य और सत्य को व्यक्ति के रूप में अच्छी तरह से साकार कर चुका है। राम और रावण दोनों ही व्यक्ति थे। एक को भगवान का रूप माना जाता था और एक को नफरत से याद किया जाता था।

आखिरकार ये अंतर क्यूँ है? विचार करने पर विवश होता है कि व्यक्ति जिस प्रकार चाहे अपनी बुद्धि और ध्यान का प्रयोग कर सकता है। व्यक्ति अपनी सुमति से स्वर्ग भी जमीन पर उतार सकता है लेकिन दूसरी ओर दूषित भावना से नंदन कानन को पतझर के रूप में परिणत कर सकता है।

राम में भी बल था और रावण में भी लेकिन फिर भी एक की जयंती मनाई जाती है और दूसरे को याद करने से नफरत होती है। इसी कारण से एक ने सुमति से लोगों के अधिकारों की रक्षा की और दूसरे ने दूषित भावना से लोगों के अधिकारों का शोषण किया। बुद्धि को किसी भी प्रकार से प्रयोग किया जा सकता है।

सुख समृद्धि का आधार : हमें यह पता चल गया है कि व्यक्ति के दिल में सुमति और कुमति दोनों का ही वास होता है। इन्हीं भावों से मनुष्य के अच्छे या बुरे होने का पता चलता है। सुमति और कुमति दोनों को ही बुद्धि का रूप माना जाता है। सुमति व्यक्ति को उन्नति और सुख संपत्ति प्रदान करती है और कुमति से व्यक्ति नाश की ओर जाता है।

रावण की बुद्धि कुमति थी। उसके भाई विभीषण ने उसे सुमति को अपनाने और राम की शरण में जाने के लिए कहा लेकिन उसने किसी की बात नहीं मानी थी। इसी लिए उसके बारे में सोचकर सभी को नफरत होती है।

सुखों का आधार : अगर आप किसी भी जगह का इतिहास उठाकर देखते हैं तो पता चलता है कि वहाँ के ज्यादातर लोगों की चितवृत्ति का फल उन्नति या अवनति का मूल कारण रहा है। कुमति को अपने व्यापक अर्थ में सब तरह की उन्नति, समृद्धि और वैभव का प्रतीक माना जाता है।

सुमति को अपने व्यापक अर्थ में कलह, फूट, स्वार्थ-प्रियता और शोषण आदि सब तरह के अपकार का प्रतीक माना जाता है। सुमति से एकता की भावना पैदा होती है। एक मनुष्य कितना भी बुद्धिमान या विवेकशील हो वो अकेला कुछ भी नहीं कर सकता।

समाज में ही वो अपनी कुशलता दिखा सकता है। जहाँ पर सहयोग और एकता की भावना होती है वहीं पर धन, सुख-संपत्ति आते हैं। ऐसे लोगों को समाज में भी गौरव मिलता है। जिस समाज में प्रेम और संगठन की भावना होती है वो भगवान की कृपा पाता है और हर क्षेत्र में उसे जीत मिलती है।

दूसरी जगह जिस देश में कुमति, द्वेष, और फूट की भावना होती है उसे हमेशा ही हार प्राप्त होती रहती है। वह पराधीनता की श्रंखलाओं में जकड़ लिया जाता है। कुमति सर्वनाश की जड़ होती है। भेद भाव को जन्म देकर कोई भी खुश नहीं रह सकता।

कुमति का प्रभाव : सुमति को सबल प्रकारों की जननी माना जाता है। सुमति से व्यक्ति में स्वाभिमान, प्रेम, देशानुराग की भावना पैदा होती है। कुमति अविद्या का परिचायक मानी जाती है और जो अविद्या में फंस जाता है वो केवल धन और मनुष्य के हित को अपना लक्ष्य बना लेता है वह अपने अस्तित्व को भूल जाता है।

वो तत्व दर्शन और आत्म दर्शन से बहुत दूर रहता है। कुमति तमोगुण की जननी होती है। अज्ञान का कहना है कि ये सारा विश्व उसका बन जाये, सब जगह केवल मेरा ही अधिकार हो। ज्ञान का कहना है कि तू सब लोगों का बन जा तू सभी के मन में समा जा। वास्तविक विद्या उसे ही माना जाता है जो मनुष्य को सभी बंधनों से आजाद करती है।

उपसंहार : आज हमारे देश में भाषावाद, भ्रष्टाचार और प्रांतीयता का जहाँ भी प्रभाव होता है वहाँ पर संकट, क्लेष, असंतोष मिलता है। ये सब प्रवृत्तियाँ कुमति से जन्म लेती हैं। इनका जड़ से नाश करने के लिए सुमति को माध्यम बनाया जा सकता है। विज्ञान की जो उपलब्धियां मनुष्य जाति की सेवा में लगी रहती हैं।

अगर व्यक्ति उनमे सुमति का परिचय दे तो वे स्वर्ग को भी धरती पर उतार सकते हैं। यदि कुमति अपना प्रभाव दिखाए तो सारा संसार ही नष्ट होने की सीमा पर पहुंच सकता है। सुमति के कारण सुख और आशा के फूल खिलते हैं लेकिन कुमति से दुःख और निराशा के काँटे पैदा होते हैं।

भाग्य और पुरुषार्थ पर निबंध-Essay on Bhagya aur Purusharth

भाग्य और पुरुषार्थ :

भूमिका : हमारा भारतीय समाज बहुत से रुढियों से ग्रस्त है। धार्मिक जीवन में जो आडंबर होते हैं वे हमे रुढियों के बंधन में और अधिक आबद्ध करते हैं। हम सब गीता को मानते हैं लेकिन फिर भी हम उस पर कभी आचरण नहीं करते।

हम लोग कर्मयोगी बनने की जगह पर भाग्यवादी बन जाते हैं। यो भाग्यवादी होते हैं वो कर्महीन बन जाते हैं और पराश्रित रहकर अपना जीवन जीते हैं। वो हमेशा बस ये सोचते रहते हैं कि भगवान ने उसकी किस्मत या भाग्य में जो भी लिखा है उसे वही मिलेगा।

कर्मयोग : हमेशा आलसी लोग ही देवों, भाग्य, काल को अपने सुखों का श्रेय देते रहते हैं। आलसी लोग खुद तो कुछ करते नहीं है और जब उनकी असफलता होती है तो इस बात का दोष वे भगवान को देते हैं। ऐसे लोगों का जीवन तिरस्कार से नरक के बराबर हो जाता है। ऐसे लोगों से समाज भी नफरत करता है। इन लोगों का आत्म विश्वास कुंठित होता है। ऐसे लोग बस दुर्गति को ही प्राप्त होते हैं।

भाग्यवाद : ऐसे लोग हमेशा ऐसा ही समझते हैं कि कर्महीन व्यक्ति कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। जो लोग भाग्य के भरोसे रहते हैं वे लोग बौद्धिक और आत्मिक शक्ति से रहित हो जाते हैं। उनके जीवन में बस निराशा होती है। ऐसे लोगों को उत्थान की जगह पर पतन, उन्नति की जगह पर अवनति, उत्कर्ष की जगह पर अपकर्ष और यश की जगह पर अपयश मिलता है। ऐसे लोगों में स्वावलंबन और आत्म-निर्णय की शक्ति खत्म हो जाती है।

पुरुषार्थ का महत्व : पुरुषार्थ व्यक्ति के लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं होता है। लेकिन भाग्यवादियों के लिए तो सब कुछ ही असंभव होता है। गीता में भी भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का ही उपदेश दिया था और उसे पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दी थी।

पुरुषार्थ में कोई भी व्यक्ति हमेशा अपने उद्देश्य की ओर आगे बढ़ता रहता है और अंत में वह अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में विजय हासिल करता है। इसी कारण कहा जाता है कि उसी व्यक्ति का जीवन सफल होता है जो पुरुषार्थ से अपना, अपनी जाति का और अपने देश का उत्थान करता है।

सुख और दुःख : मनुष्य को अपने जीवन में वास्तविक सुख और शांति उसके द्वारा किये गये कर्मों से मिलती है। जब उसके द्वारा किये गये उसके पुरुषार्थ का फल उसके सामने होता हैं तो उसका ह्रदय खुशी से उछलने लगता है। वो आत्म गौरव का अनुभव करने लगता है।

जो लोग पुरुषार्थी होते हैं उन्हें कभी-भी किसी चीज का अभाव नहीं होता है। वो किसी के सामने हाथ नहीं फैलातें हैं वो अपने श्रम पर दृढ विश्वास रखतें हैं। उसे पता होता कि वह जो भी चाहेगा उसे प्राप्त कर लेगा। वह हमेशा आत्म-निर्भर होता है। उसे कभी-भी दूसरों का मुंह नहीं देखना पड़ता है।

पुरुषार्थ के करने से मनुष्य का अंत:करण गंगा की तरह पूर्ण रूप से पवित्र हो जाता है। संसार के सभी दुःख बस उन्हीं लोगों को सताते हैं जिन लोगों के पास इन सब पर सोचने के लिए समय नहीं होता है और उनकी पूर्ति के साधन भी नहीं होते हैं। उन लोगों के पास इन सब बातों को सोचने के लिए समय ही नहीं होता है।

अकर्मण्यता : बस भगवान की इच्छा और भाग्य पर चलना ही कायरता और अकर्मण्यता होती है। व्यक्ति अपने भाग्य का विधाता खुद होता है। वो दूध में जितनी चीनी डालेगा दूध उतना ही मीठा होगा। जिसने अपने जीवन में उद्देश्य को पूरा करने के लिए जितना परिश्रम किया होगा उसे उसकी सफलता अवश्य मिली होगी। जो लोग खुद की सहायता करने में समर्थ होते हैं भगवान भी उन्हीं की सहायता करता है। जो लोग कायर होते हैं भगवान खुद भी उन लोगों से डरता है।

कर्म का फल : मेहनत करने से व्यक्ति को सबसे बड़ा लाभ होता है कि उसे आत्मिक शक्ति मिलती है। उसका दिल पवित्र होता है, उसके संकल्पों में दिव्यता आती है, उसे सच्चा ऐश्वर्य मिलता है, उससे व्यक्तिगत जीवन में सदैव उन्नति मिलती है। जीवन में सफलता पाने के लिए व्यक्ति क्या काम नहीं करता यहाँ तक कि बुरे से बुरा काम करने के लिए भी तैयार रहता है।

लेकिन अगर वो परिश्रम करे तो सफलता उसके कदम चूमने लगेगी। उसे लगातार सफलता मिलेगी और वह बहुत ही उच्च स्तर पर पहुंच जायेगा। व्यक्ति को केवल इच्छा करने से ही सिद्धि नहीं मिलती है उसे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को कठिन परिश्रम करना पड़ता है। जो व्यक्ति अपने जीवन में जितना परिश्रम करता है उसे उसके जीवन में उतनी ही सफलता मिलती है।

उपसंहार : हमें अपने देश की उन्नति के लिए भाग्यवाद का त्याग कर पुरुषार्थी बनना होगा। पुरुषार्थी बनने से ही व्यक्ति को धन, यश, मान-सम्मान सब कुछ मिलता है क्योंकि परिश्रमी व्यक्ति ही जीवन में सफलता प्राप्त कर सकता है भाग्यवादी व्यक्ति नहीं।